Sunday, October 16, 2011

मैं

हंसते-हंसते अचानक रुका !
सोचा
किसके साथ मैं क्यों हंसा !
सोचा
ये मेरी शक्ल कैसे !
सोचा
ये मेरी कलम कैसे !
सोचा
ये मेरे मित्र कौन !
सोचा
ये मेरा शरीर कैसे !
सोचा
ये मैं ज़िन्दा कैसे !
सोचा
ये मेरी आँखें कैसे !
सोचा
ये मेरा घर कैसे !
मैं तो इधर गया था
हाँ इधर !
सोचा
तो मैं उधर कैसे !!
Reactions:
Posted on by Abhishek Jain | 2 comments

2 comments:

  1. nice lines but difficult to understand:)

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  2. Its all about confusion nothing to understandable.

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